
तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 101-105#
Thirukkural in Hindi, Chapters 101 to 105#
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Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).
भाग–२: अर्थ- कांड
अध्याय 101. निष्फल धन#
1001 भर कर घर भर प्रचुर धन, जो करता नहिं भोग ।धन के नाते मृतक है, जब है नहिं उपयोग ॥
1002 ‘सब होता है अर्थ से’, रख कर ऐसा ज्ञान ।कंजूसी के मोह से, प्रेत-जन्म हो मलान ॥
1003 लोलुप संग्रह मात्र का, यश का नहीं विचार ।ऐसे लोभी का जनम, है पृथ्वी को भार ॥
1004 किसी एक से भी नहीं, किया गया जो प्यार ।निज अवशेष स्वरूप वह, किसको करे विचार ॥
1005 जो करते नहिं दान ही, करते भी नहिं भोग ।कोटि कोटि धन क्यों न हो, निर्धन हैं वे लोग ॥
1006 योग्य व्यक्ति को कुछ न दे, स्वयं न करता भोग ।विपुल संपदा के लिये, इस गुण का नर रोग ॥
1007 कुछ देता नहिं अधन को, ऐसों का धन जाय ।क्वाँरी रह अति गुणवती, ज्यों बूढ़ी हो जाय ॥
1008 अप्रिय जन के पास यदि, आश्रित हो संपत्ति ।ग्राम-मध्य विष-वृक्ष ज्यों, पावे फल-संपत्ति ॥
1009 प्रेम-भाव तज कर तथा, भाव धर्म से जन्य ।आत्म-द्रोह कर जो जमा, धन हथियाते अन्य ॥
1010 उनकी क्षणिक दरिद्रता, जो नामी धनवान ।जल से खाली जलद का, है स्वभाव समान ॥
अध्याय 102. लज्जाशीलता#
1011 लज्जित होना कर्म से, लज्जा रही बतौर ।सुमुखी कुलांगना-सुलभ, लज्जा है कुछ और ॥
1012 अन्न वस्त्र इत्यादि हैं, सब के लिये समान ।सज्जन की है श्रेष्ठता, होना लज्जावान ॥
1013 सभी प्राणियों के लिये, आश्रय तो है देह ।रखती है गुण-पूर्णता, लज्जा का शुभ गेह ॥
1014 भूषण महानुभाव का, क्या नहिं लज्जा-भाव ।उसके बिन गंभीर गति, क्या नहिं रोग-तनाव ॥
1015 लज्जित है, जो देख निज, तथा पराया दोष ।उनको कहता है जगत, ‘यह लज्जा का कोष’ ॥
1016 लज्जा को घेरा किये, बिना सुरक्षण-योग ।चाहेंगे नहिं श्रेष्ठ जन, विस्तृत जग का भोग ॥
1017 लज्जा-पालक त्याग दें, लज्जा के हित प्राण ।लज्जा को छोड़ें नहीं, रक्षित रखने जान ॥
1018 अन्यों को लज्जित करे, करते ऐसे कर्म ।उससे खुद लज्जित नहीं, तो लज्जित हो धर्म ॥
1019 यदि चूके सिद्धान्त से, तो होगा कुल नष्ट ।स्थाई हो निर्लज्जता, तो हों सब गुण नष्ट ॥
1020 कठपुथली में सूत्र से, है जीवन-आभास ।त्यों है लज्जाहीन में, चैतन्य का निवास ॥
अध्याय 103. वंशोत्कर्ष-विधान#
1021 ‘हाथ न खींचूँ कर्म से, जो कुल हित कर्तव्य ।इसके सम नहिं श्रेष्ठता, यों है जो मन्तव्य ॥
1022 सत् प्रयत्न गंभीर मति, ये दोनों ही अंश ।क्रियाशील जब हैं सतत, उन्नत होता वंश ॥
1023 ‘कुल को अन्नत में करूँ’, कहता है दृढ बात ।तो आगे बढ़ कमर कस, दैव बँटावे हाथ ॥
1024 कुल हित जो अविलम्ब ही, हैं प्रयत्न में चूर ।अनजाने ही यत्न वह, बने सफलता पूर ॥
1025 कुल अन्नति हित दोष बिन, जिसका है आचार ।बन्धु बनाने को उसे, घेर रहा संसार ॥
1026 स्वयं जनित निज वंश का, परिपालन का मान ।अपनाना है मनुज को, उत्तम पौरुष जान ॥
1027 महावीर रणक्षेत्र में, ज्यों हैं जिम्मेदार ।त्यों है सुयोग्य व्यक्ति पर, निज कुटुंब का भार ॥
1028 कुल-पालक का है नहीं, कोई अवसर खास ।आलसवश मानी बने, तो होता है नाश ॥
1029 जो होने देता नहीं, निज कुटुंब में दोष ।उसका बने शरीर क्या, दुख-दर्दों का कोष ॥
1030 योग्य व्यक्ति कुल में नहीं, जो थामेगा टेक ।जड़ में विपदा काटते, गिर जाये कुल नेक ॥
अध्याय 104. कृषि#
1031 कृषि-अधीन ही जग रहा, रह अन्यों में घुर्ण ।सो कृषि सबसे श्रेष्ठ है, यद्यपि है श्रमपूर्ण ॥
1032 जो कृषि की क्षमता बिना, करते धंधे अन्य ।कृषक सभी को वहन कर, जगत-धुरी सम गण्य ॥
1033 जो जीवित हैं हल चला, उनका जीवन धन्य ।झुक कर खा पी कर चलें, उनके पीचे अन्य ॥
1034 निज नृप छत्रच्छाँह में, कई छत्रपति शान ।छाया में पल धान की, लाते सौम्य किसान ॥
1035 निज कर से हल जोत कर, खाना जिन्हें स्वभाव ।माँगें नहिं, जो माँगता, देंगे बिना दुराव ॥
1036 हाथ खिँचा यदि कृषक का, उनकी भी नहिं टेक ।जो ऐसे कहते रहे ‘हम हैं निस्पृह एक’ ॥
1037 एक सेर की सूख यदि, पाव सेर हो धूल ।मुट्ठी भर भी खाद बिन, होगी फ़सल अतूल ॥
1038 खेत जोतने से अधिक, खाद डालना श्रेष्ठ ।बाद निराकर सींचना, फिर भी रक्षण श्रेष्ठ ॥
1039 चल कर यदि देखे नहीं, मालिक दे कर ध्यान ।गृहिणी जैसी रूठ कर, भूमि करेगी मान ॥
1040 ‘हम दरिद्र हैं’ यों करे, सुस्ती में आलाप ।भूमि रूप देवी उसे, देख हँसेगी आप ॥
अध्याय 105. दरिद्रता#
1041 यदि पूछो दारिद्र्य सम, दुःखद कौन महान ।तो दुःखद दारिद्र्य सम, दारिद्रता ही जान ॥
1042 निर्धनता की पापिनी, यदि रहती है साथ ।लोक तथा परलोक से, धोना होगा हाथ ॥
1043 निर्धनता के नाम से, जो है आशा-पाश ।कुलीनता, यश का करे,एक साथ ही नाश ॥
1044 निर्धनता पैदा करे, कुलीन में भी ढील ।जिसके वश वह कह उठे, हीन वचन अश्लील ॥
1045 निर्धनता के रूप में, जो है दुख का हाल ।उसमें होती है उपज, कई तरह की साल ॥
1046 यद्यपि अनुसंधान कर, कहे तत्व का अर्थ ।फिर भी प्रवचन दिन का, हो जाता है व्यर्थ ॥
1047 जिस दरिद्र का धर्म से, कुछ भी न अभिप्राय ।जननी से भी अन्य सम, वह तो देखा जाय ॥
1048 कंगाली जो कर चुकी, कल मेरा संहार ।अयोगी क्या आज भी, करने उसी प्रकार ॥
1049 अन्तराल में आग के, सोना भी है साध्य ।आँख झपकना भी ज़रा, दारिद में नहिं साध्य ॥
1050 भोग्य-हीन रह, दिन का, लेना नहिं सन्यास ।माँड-नमक का यम बने, करने हित है नाश ॥
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