
तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 106-110#
Thirukkural in Hindi, Chapters 106 to 110#
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Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).
भाग–२: अर्थ- कांड
अध्याय 106. याचना#
1051 याचन करने योग्य हों, तो माँगना ज़रूर ।उनका गोपन-दोष हो, तेरा कुछ न कसूर ॥
1052 यचित चीज़ें यदि मिलें, बिना दिये दुख-द्वन्द ।याचन करना मनुज को, देता है आनन्द ॥
1053 खुला हृदय रखते हुए, जो मानेंगे मान ।उनके सम्मुख जा खड़े, याचन में भी शान ॥
1054 जिन्हें स्वप्न में भी ‘नहीं’, कहने की नहिं बान ।उनसे याचन भी रहा, देना ही सम जान ॥
1055 सम्मुख होने मात्र से, बिना किये इनकार ।दाता हैं जग में, तभी, याचन है स्वीकार ॥
1056 उन्हें देख जिनको नहीं, ‘ना’, कह सहना कष्ट ।दुःख सभी दारिद्र्य के, एक साथ हों नष्ट ॥
1057 बिना किये अवहेलना, देते जन को देख ।मन ही मन आनन्द से, रहा हर्ष-अतिरेक ॥
1058 शीतल थलयुत विपुल जग, यदि हो याचक-हीन ।कठपुथली सम वह रहे, चलती सूत्राधीन ॥
1059 जब कि प्रतिग्रह चाहते, मिलें न याचक लोग ।दाताओं को क्या मिले, यश पाने का योग ॥
1060 याचक को तो चाहिये, ग्रहण करे अक्रोध ।निज दरिद्रता-दुःख ही, करे उसे यह बोध ॥
अध्याय 107. याचना-भय#
1061 जो न छिपा कर, प्रेम से, करते दान यथेष्ट ।उनसे भी नहिं माँगना, कोटि गुना है श्रेष्ठ ॥
1062 यदि विधि की करतार ने, भीख माँग नर खाय ।मारा मारा फिर वही, नष्ट-भ्रष्ट हो जाय ॥
1063 ‘निर्धनता के दुःख को, करें माँग कर दूर’ ।इस विचार से क्रूरतर, और न है कुछ क्रूर ॥
1064 दारिदवश भी याचना, जिसे नहीं स्वीकार ।भरने उसके पूर्ण-गुण, काफी नहिं संसार ॥
1065 पका माँड ही क्यों न हो, निर्मल नीर समान ।खाने से श्रम से कमा, बढ़ कर मधुर न जान ॥
1066 यद्यपि माँगे गाय हित, पानी का ही दान ।याचन से बदतर नहीं, जिह्वा को अपमान ॥
1067 याचक सबसे याचना, यही कि जो भर स्वाँग ।याचन करने पर न दें, उनसे कभी न माँग ॥
1068 याचन रूपी नाव यदि, जो रक्षा बिन नग्न ।गोपन की चट्टान से, टकराये तो भग्न ॥
1069 दिल गलता है, ख्याल कर, याचन का बदहाल ।गले बिना ही नष्ट हो, गोपन का कर ख्याल ॥
1070 ‘नहीं’ शब्द सुन जायगी, याचक जन की जान ।गोपन करते मनुज के, कहाँ छिपेंगे प्राण ॥
अध्याय 108. नीचता#
1071 हैं मनुष्य के सदृश ही, नीच लोग भी दृश्य ।हमने तो देखा नहीं, ऐसा जो सादृश्य ॥
1072 चिन्ता धर्माधर्म की, नहीं हृदय के बीच ।सो बढ़ कर धर्मज्ञ से, भाग्यवान हैं नीच ॥
1073 नीच लोग हैं देव सम, क्योंकि निरंकुश जीव ।वे भी करते आचरण, मनमानी बिन सींव ॥
1074 मनमौजी ऐसा मिले, जो अपने से खर्व ।तो उससे बढ़ खुद समझ, नीच करेगा गर्व ॥
1075 नीचों के आचार का, भय ही है आधार ।भय बिन भी कुछ तो रहे, यदि हो लाभ-विचार ॥
1076 नीच मनुज ऐसा रहा, जैसा पिटता ढोल ।स्वयं सुने जो भेद हैं, ढो अन्यों को खोल ॥
1077 गाल-तोड़ घूँसा बिना, जो फैलाये हाथ ।झाडेंगे नहिं अधम जन, निज झूठा भी हाथ ॥
1078 सज्जन प्रार्थन मात्र से, देते हैं फल-दान ।नीच निचोड़ों ईख सम, तो देते रस-पान ॥
1079 खाते पीते पहनते, देख पराया तोष ।छिद्रान्वेषण-चतुर जो, नीच निकाले दोष ॥
1080 नीच लोग किस योग्य हों, आयेंगे क्या काम ।संकट हो तो झट स्वयं, बिक कर बनें गुलाम ॥
भाग–३: काम- कांड
अध्याय 109. सौन्दर्य की पीड़ा#
1081 क्या यह है देवांगना, या सुविशेष मयूर ।या नारी कुंड़ल-सजी, मन है भ्रम में चूर ॥
1082 दृष्टि मिलाना सुतनु का, होते दृष्टि-निपान ।हो कर खुद चँडी यथा, चढ़ आये दल साथ ॥
1083 पहले देखा है नहीं, अब देखा यम कौन ।लडते विशाल नेत्रयुत, वह है स्त्री-गुण-भौन ॥
1084 मुग्धा इस स्त्री-रत्न के, दिखी दृगों की रीत ।खाते दर्शक-प्राण हैं, यों है गुण विपरीत ॥
1085 क्या यम है, या आँख है, या है मृगी सुरंग ।इस मुग्धा की दृष्टि में, है तीनों का ढंग ॥
1086 ऋजु हो टेढ़ी भृकुटियाँ, मना करें दे छाँह ।तो इसकी आँखें मुझे, हिला, न लेंगी आह ॥
1087 अनत कुचों पर नारि के, पड़ा रहा जो पाट ।मद-गज के दृग ढ़ांकता, मुख-पट सम वह ठाट ॥
1088 उज्जवल माथे से अहो, गयी शक्ति वह रीत ।भिड़े बिना रण-भूमि में, जिससे रिपु हों भीत ॥
1089 सरल दृष्टि हरिणी सदृश, औ’ रखती जो लाज ।उसके हित गहने बना, पहनाना क्या काज ॥
1090 हर्षक है केवल उसे, जो करता है पान ।दर्शक को हर्षक नहीं, मधु तो काम समान ॥
अध्याय 110. संकेत समझना#
1091 इसके कजरारे नयन, रखते हैं दो दृष्टि ।रोग एक, उस रोग की, दवा दूसरी दृष्टि ॥
1092 आंख बचा कर देखना, तनिक मुझे क्षण काल ।अर्द्ध नहीं, संयोग का, उससे अधिक रसाल ॥
1093 देखा, उसने देख कर, झुका लिया जो सीस ।वह क्यारी में प्रेम की, देना था जल सींच ॥
1094 मैं देखूँ तो डालती, दृष्टि भूमि की ओर ।ना देखूँ तो देख खुद, मन में रही हिलोर ॥
1095 सीधे वह नहीं देखती, यद्यपि मेरी ओर ।सुकुचाती सी एक दृग, मन में रही हिलोर ॥
1096 यदुअपि वह अनभिज्ञ सी, करती है कटु बात ।बात नहीं है क्रुद्ध की, झट होती यह ज्ञात ॥
1097 रुष्ट दृष्टि है शत्रु सम, कटुक वचन सप्रीति ।दिखना मानों अन्य जन, प्रेमी जन की रीति ॥
1098 मैं देखूँ तो, स्निग्ध हो, करे मंद वह हास ।सुकुमारी में उस समय, एक रही छवी ख़ास ॥
1099 उदासीन हो देखना, मानों हो अनजान ।प्रेमी जन के पास ही, रहती ऐसी बान ॥
1100 नयन नयन मिल देखते, यदि होता है योग ।वचनों का मूँह से कहे, है नहिं कुछ उपयोग ॥
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