
तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 11-15#
Thirukkural in Hindi, Chapters 11 to 15#
Chapters 6 to 10 · All chapters · Chapter list · Chapters 16 to 20
Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).
भाग–१: धर्म- कांड
अध्याय 11. कृतज्ञता#
101 उपकृत हुए बिना करे, यदि कोइ उपकार ।दे कर भू सुर-लोक भी, मुक्त न हो आभार ॥
102 अति संकट के समय पर, किया गया उपकार ।भू से अधिक महान है, यद्यपि अल्पाकार ॥
103 स्वार्थरहित कृत मदद का, यदि गुण आंका जाय ।उदधि-बड़ाई से बड़ा, वह गुण माना जाय ॥
104 उपकृति तिल भर ही हुई, तो भी उसे सुजान ।मानें ऊँचे ताड़ सम, सुफल इसी में जान ॥
105 सीमित नहिं, उपकार तक, प्रत्युपकार- प्रमाण ।जितनी उपकृत-योग्यता, उतना उसका मान ॥
106 निर्दोषों की मित्रता, कभी न जाना भूल ।आपद-बंधु स्नेह को, कभी न तजना भूल ॥
107 जिसने दुःख मिटा दिया, उसका स्नेह स्वभाव ।सात जन्म तक भी स्मरण, करते महानुभाव ॥
108 भला नहीं है भूलना, जो भी हो उपकार ।भला यही झट भूलना, कोई भी अपकार ॥
109 हत्या सम कोई करे, अगर बड़ी कुछ हानि ।उसकी इक उपकार-स्मृति, करे हानि की हानि ॥
110 जो भी पातक नर करें, संभव है उद्धार ।पर है नहीं कृतघ्न का, संभव ही निस्तार ॥
अध्याय 12. मध्यस्थता#
111 मध्यस्थता यथेष्ट है, यदि हो यह संस्कार ।शत्रु मित्र औ’ अन्य से, न्यायोचित व्यवहार ॥
112 न्यायनिष्ठ की संपदा, बिना हुए क्षयशील ।वंश वंश का वह रहे, अवलंबन स्थितिशील ॥
113 तजने से निष्पक्षता, जो धन मिले अनन्त ।भला, भले ही, वह करे तजना उसे तुरन्त ॥
114 कोई ईमान्दार है, अथवा बेईमान ।उन उनके अवशेष से, होती यह पहचान ॥
115 संपन्नता विपन्नता, इनका है न अभाव ।सज्जन का भूषण रहा, न्यायनिष्ठता भाव ॥
116 सर्वनाश मेरा हुआ, यों जाने निर्धार ।चूक न्याय-पथ यदि हुआ, मन में बुरा विचार ॥
117 न्यायवान धर्मिष्ठ की, निर्धनता अवलोक ।मानेगा नहिं हीनता, बुद्धिमान का लोक ॥
118 सम रेखा पर हो तुला, ज्यों तोले सामान ।भूषण महानुभाव का, पक्ष न लेना मान ॥
119 कहना सीधा वचन है, मध्यस्थता ज़रूर ।दृढ़ता से यदि हो गयी, चित्त-वक्रता दूर ॥
120 यदि रखते पर माल को, अपना माल समान ।वणिक करे वाणीज्य तो, वही सही तू जान ॥
अध्याय 13. संयम्शीलता#
121 संयम देता मनुज को, अमर लोक का वास ।झोंक असंयम नरक में, करता सत्यानास ॥
122 संयम की रक्षा करो, निधि अनमोल समान ।श्रेय नहीं है जीव को, उससे अधिक महान ॥
123 कोई संयमशील हो, अगर जानकर तत्व ।संयम पा कर मान्यता, देगा उसे महत्व ॥
124 बिना टले निज धर्म से, जो हो संयमशील ।पर्वत से भी उच्चतर, होगा उसका डील ॥
125 संयम उत्तम वस्तु है, जन के लिये अशेष ।वह भी धनिकों में रहे, तो वह धन सुविशेष ॥
126 पंचेन्द्रिय-निग्राह किया, कछुआ सम इस जन्म ।तो उससे रक्षा सुदृढ़, होगी सातों जन्म ॥
127 चाहे औरोंको नहीं, रख लें वश में जीभ ।शब्द-दोष से हों दुखी, यदि न वशी हो जीभ ॥
128 एक बार भी कटुवचन, पहुँचाये यदि कष्ट ।सत्कर्मों के सुफल सब, हो जायेंगे नष्ट ॥
129 घाव लगा जो आग से, संभव है भर जाय ।चोट लगी यदि जीभ की, कभी न मोटी जाय ॥
130 क्रोध दमन कर जो हुआ, पंडित यमी समर्थ ।धर्म-देव भी जोहता, बाट भेंट के अर्थ ॥
अध्याय 14. आचारशीलता#
131 सदाचार-संपन्नता, देती सब को श्रेय ।तब तो प्राणों से अधिक, रक्षणीय वह ज्ञेय ॥
132 सदाचार को यत्न से, रखना सहित विवेक ।अनुशीलन से पायगा, वही सहायक एक ॥
133 सदाचार-संपन्नता, है कुलीनता जान ।चूके यदि आचार से, नीच जन्म है मान ॥
134 संभव है फिर अध्ययन, भूल गया यदि वेद ।आचारच्युत विप्र के, होगा कुल का छेद ॥
135 धन की ज्यों ईर्ष्यालु के, होती नहीं समृद्धि ।आचारहीन की नहीं, कुलीनता की वृद्धि ॥
136 सदाचार दुष्कर समझ, धीर न खींचे हाथ ।परिभव जो हो जान कर, उसकी च्युति के साथ ॥
137 सदाचार से ही रही, महा कीर्ति की प्राप्ति ।उसकी च्युति से तो रही, आति निन्दा की प्राप्ति ॥
138 सदाचार के बीज से, होता सुख उत्पन्न ।कदाचार से ही सदा, होता मनुज विपन्न ॥
139 सदाचारयुत लोग तो, मुख से कर भी भूल ।कहने को असमर्थ हैं, बुरे वचन प्रतिकूल ॥
140 जिनको लोकाचार की, अनुगति का नहिं ज्ञान ।ज्ञाता हों सब शास्त्र के, जानों उन्हें अजान ॥
अध्याय 15. परदार- विरति#
141 परपत्नी-रति-मूढ़ता, है नहिं उनमें जान ।धर्म-अर्थ के शास्त्र का, जिनको तत्वज्ञान ॥
142 धर्म-भ्रष्टों में नही, ऐसा कोई मूढ़ ।जैसा अन्यद्वार पर, खड़ा रहा जो मूढ़ ॥
143 दृढ़ विश्वासी मित्र की, स्त्री से पापाचार ।जो करता वो मृतक से, भिन्न नहीं है, यार ॥
144 क्या होगा उसको अहो, रखते विभव अनेक ।यदि रति हो पर-दार में, तनिक न बुद्धि विवेक ॥
145 पर-पत्नी-रत जो हुआ, सुलभ समझ निश्शंक ।लगे रहे चिर काल तक, उसपर अमिट कलंक ॥
146 पाप, शत्रुता, और भय, निन्दा मिल कर चार ।ये उसको छोड़ें नहीं, जो करता व्यभिचार ॥
147 जो गृहस्थ पर-दार पर, होवे नहिं आसक्त ।माना जाता है वही, धर्म-कर्म अनुरक्त ॥
148 पर-नारी नहिं ताकना, है धीरता महान ।धर्म मात्र नहिं संत का, सदाचरण भी जान ॥
149 सागर-बलयित भूमि पर, कौन भोग्य के योग्य ।आलिंगन पर- नारि को, जो न करे वह योग्य ॥
150 पाप- कर्म चाहे करें, धर्म मार्ग को छोड़ ।पर-गृहिणी की विरति हो, तो वह गुण बेजोड़ ॥
Chapters 6 to 10 · All chapters · Chapter list · Chapters 16 to 20

Comments: