
तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 116-120#
Thirukkural in Hindi, Chapters 116 to 120#
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Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).
भाग–३: काम- कांड
अध्याय 116. विरह-वेदना#
1151 अगर बिछुड़ जाते नहीं, मुझे जताओ नाथ ।जो जियें उनसे कहो, झट फिरने की बात ॥
1152 पहले उनकी दृष्टि तो, देती थी सुख-भोग ।विरह-भीति से दुखद है, अब उनका संयोग ॥
1153 विज्ञ नाथ का भी कभी, संभव रहा प्रवास ।सो करना संभव नहीं, इनपर भी विश्वास ॥
1154 छोड़ चलेंगे यदि सदय, कर निर्भय का घोष ।जो दृढ़-वच विश्वासिनी, उसका है क्या दोष ॥
1155 बचा सके तो यों बचा, जिससे चलें न नाथ ।फिर मिलना संभव नहीं, छोड़ गये यदि साथ ॥
1156 विरह बताने तक हुए, इतने निठुर समर्थ ।प्रेम करेंगे लौट कर, यह आशा है व्यर्थ ॥
1157 नायक ने जो छोड़ कर, गमन किया, वह बात ।वलय कलाई से पतित, क्या न करें विख्यात ॥
1158 उस पुर में रहना दुखद, जहाँ न साथिन लोग ।उससे भी बढ़ कर दुखद, प्रिय से रहा वियोग ॥
1159 छूने पर ही तो जला, सकती है, बस आग ।काम-ज्वर सम वह जला, सकती क्या, कर त्याग ॥
1160 दुखद विरह को मानती, चिन्ता; व्याधि न नेक ।विरह-वेदना सहन कर, जीवित रहीं अनेक ॥
अध्याय 117. विरह-क्षमा की व्यथा#
1161 यथा उलीचे सोत का, बढ़ता रहे बहाव ।बढ़ता है यह रोग भी, यदि मैं करूँ छिपाव ॥
1162 गोपन भी इस रोग का, है नहिं वश की बात ।कहना भी लज्जाजनक, रोगकार से बात ॥
1163 मेरी दुबली देह में, प्राणरूप जो डांड ।लटके उसके छोर में, काम व लज्जा कांड ॥
1164 काम-रोग का तो रहा, पारावार अपार ।पर रक्षक बेड़ा नहीं, उसको करने पार ॥
1165 जो देते हैं वेदना, रह कर प्रिय जन, खैर ।क्या कर बैठेंगे अहो, यदि रखते हैं वैर ॥
1166 जो है, बस, यह काम तो, सुख का पारावार ।पीडा दे तो दुःख है, उससे बड़ा अपार ॥
1167 पार न पाती पैर कर, काम-समुद्र महान ।अर्द्ध रात्रि में भी निविड़, रही अकेली जान ॥
1168 सुला जीव सब को रही, दया-पात्र यह रात ।इसको मुझको छोड़ कर, और न कोई साथ ॥
1169 ये रातें जो आजकल, लम्बी हुई अथोर ।निष्ठुर के नैष्ठुर्य से, हैं खुद अधिक कठोर ॥
1170 चल सकते हैं प्रिय के यहाँ, यदि झट हृदय समान ।नहीं तैरते बाढ़ में, यों मेरे दृग, जान ॥
अध्याय 118. नेत्रों का आतुरता से क्षय#
1171 अब राते हैं क्यों नयन, स्वयं दिखा आराध्य ।मुझे हुआ यह रोग है, जो बन गया असाध्य ॥
1172 सोचे समझे बिन नयन, प्रिय को उस दिन देख ।अब क्यों होते हैं व्यक्ति, रखते कुछ न विवेक ॥
1173 नयनों ने देखा स्वयं, आतुरता के साथ ।अब जो रोते हैं स्वयं, है हास्यास्पद बात ॥
1174 मुझमें रुज उत्पन्न कर, असाध्य औ’ अनिवार्य ।सूख गये, ना कर सके, दृग रोने का कार्य ॥
1175 काम-रोग उत्पन्न कर, सागर से विस्तार ।नींद न पा मेरे नयन, सहते दुःख अपार ॥
1176 ओहो यह अति सुखद है, मुझको दुख में डाल ।अब ये दृग सहते स्वयं, यह दुख, हो बेहाल ॥
1177 दिल पसीज, थे देखते, सदा उन्हें दृग सक्त ।सूख जाय दृग-स्रोत अब, सह सह पीड़ा सख्त ॥
1178 वचन मात्र से प्रेम कर, दिल से किया न प्रेम ।उस जन को देखे बिना, नेत्रों को नहिं क्षेम ॥
1179 ना आवें तो नींद नहिं, आवें, नींद न आय ।दोनों हालों में नयन, सहते हैं अति हाय ॥
1180 मेरे सम जिनके नयन, पिटते ढोल समान ।उससे पुरजन को नहीं, कठिन भेद का ज्ञान ॥
अध्याय 119. पीलापन-जनित पीड़ा#
1181 प्रिय को जाने के लिये, सम्मति दी उस काल ।अब जा कर किससे कहूँ, निज पीलापन-हाल ॥
1182 पीलापन यह गर्व कर, ‘मैं हूँ उनसे प्राप्त’ ।चढ़ कर मेरी देह में, हो जाता है व्याप्त ॥
1183 पीलापन औ’ रोग का, करके वे प्रतिदान ।मेरी छवि औ’ लाज का, ले कर चले सुदान ॥
1184 उनके गुण का स्मरण कर, करती हूँ गुण-गान ।फिर भी पीलापन चढ़ा, तो क्या यह धोखा न ॥
1185 वह देखो, जाते बिछुड़, मेरे प्रियतम आप्त ।यह देखो, इस देह पर, पीलापन है व्याप्त ॥
1186 दीपक बुझने की यथा, तम की जो है ताक ।प्रिय-आलिंगन ढील पर, पैलापन की ताक ॥
1187 आलिंगन करके रही, करवट बदली थोर ।उस क्षण जम कर छा गया, पीलापन यह घोर ॥
1188 ‘यह है पीली पड़ गयी’, यों करते हैं बात ।इसे त्याग कर वे गये, यों करते नहिं बात ॥
1189 मुझे मना कर तो गये, यदि सकुशल हों नाथ ।तो मेरा तन भी रहे, पीलापन के साथ ॥
1190 अच्छा है पाना स्वयं, पीलापन का नाम ।प्रिय का तजना बन्धुजन, यदि न करें बदनाम ॥
अध्याय 120. विरह-वेदनातिरेक#
1191 जिससे अपना प्यार है, यदि पाती वह प्यार ।बीज रहित फल प्रेम का, पाती है निर्धार ॥
1192 जीवों का करता जलद, ज्यों जल दे कर क्षेम ।प्राण-पियारे का रहा, प्राण-प्रिया से प्रेम ॥
1193 जिस नारी को प्राप्त है, प्राण-नाथ का प्यार ।‘जीऊँगी’ यों गर्व का, उसको है अधिकार ॥
1194 उसकी प्रिया बनी नहीं, जो उसका है प्रेय ।तो बहुमान्या नारि भी, पुण्यवति नहिं ज्ञेय ॥
1195 प्यार किया मैंने जिन्हें, यदि खुद किया न प्यार ।तो उनसे क्या हो सके, मेरा कुछ उपकार ॥
1196 प्रेम एक-तरफ़ा रहे, तो है दुखद अपार ।दोय तरफ़ हो तो सुखद, ज्यों डंडी पर भार ॥
1197 जम कर सक्रिय एक में, रहा मदन बेदर्द ।क्या वह समझेगा नहीं, मेरा दुःख व दर्द ॥
1198 प्रियतम से पाये बिना, उसका मधुमय बैन ।जग में जीती स्त्री सदृश, कोई निष्ठुर है न ॥
1199 प्रेम रहित प्रियतम रहे, यद्यपि है यह ज्ञात ।कर्ण मधुर ही जो मिले, उनकी कोई बात ॥
1200 प्रेम हीन से कठिन रुज, कहने को तैयार ।रे दिल ! तू चिरजीव रह ! सुखा समुद्र अपार ॥
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