
तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 121-125#
Thirukkural in Hindi, Chapters 121 to 125#
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Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).
भाग–३: काम- कांड
अध्याय 121. स्मरण में एकान्तता-दुःख#
1201 स्मरण मात्र से दे सके, अक्षय परमानन्द ।सो तो मधु से काम है, बढ़ कर मधुर अमन्द ॥
1202 दुख-नाशक उसका स्मरण, जिससे है निज प्रेम ।जो सुखदायक ही रहा, किसी हाल में प्रेम ॥
1203 छींका ही मैं चाहती, छींक गयी दब साथ ।स्मरण किया ही चाहते, भूल गये क्या नाथ ॥
1204 उनके दिल में क्या रहा, मेरा भी आवास ।मेरे दिल में, ओह, है, उनका सदा निवास ॥
1205 निज दिल से मुझको हटा, कर पहरे का साज़ ।मेरे दिल आते सदा, आती क्या नहिं लाज ॥
1206 मिलन-दिवस की, प्रिय सहित, स्मृति से हूँ सप्राण ।उस स्मृति के बिन किस तरह, रह सकती सप्राण ॥
1207 मुझे ज्ञात नहिं भूलना, हृदय जलाती याद ।भूलूँगी मैं भी अगर, जाने क्या हो बाद ॥
1208 कितनी ही स्मृति मैं करूँ, होते नहिं नाराज़ ।करते हैं प्रिय नाथ तो, इतना बड़ा लिहाज़ ॥
1209 ‘भिन्न न हम’, जिसने कहा, उसकी निर्दय बान ।सोच सोच चलते बने, मेरे ये प्रिय प्राण ॥
1210 बिछुड़ गये संबद्ध रह, जो मेरे प्रिय कांत ।जब तक देख न लें नयन, डूब न, जय जय चांद ॥
अध्याय 122. स्वप्नावस्था का वर्णन#
1211 प्रियतम का जो दूत बन, आया स्वप्नाकार ।उसका मैं कैसे करूँ, युग्य अतिथि-सत्कार ॥
1212 यदि सुन मेरी प्रार्थना, दृग हों निद्रावान ।दुख सह बचने की कथा, प्रिय से कहूँ बखान ॥
1213 जाग्रत रहने पर कृपा, करते नहीं सुजान ।दर्शन देते स्वप्न में, तब तो रखती प्राण ॥
1214 जाग्रति में करते नहीं, नाथ कृपा कर योग ।खोज स्वप्न ने ला दिया, सो उसमें सुख-भोग ॥
1215 आँखों में जब तक रहे, जाग्रति में सुख-भोग ।सपने में भी सुख रहा, जब तक दर्शन-योग ॥
1216 यदि न रहे यह जागरण, तो मेरे प्रिय नाथ ।जो आते हैं स्वप्न में, छोड़ न जावें साथ ॥
1217 कृपा न कर जागरण में, निष्ठुर रहे सुजन ।पीड़ित करते किसलिये, मुझे स्वप्न में प्राण ॥
1218 गले लगाते नींद में, पर जब पडती जाग ।तब दिल के अन्दर सुजन, झट जाते हैं भाग ॥
1219 जाग्रति में अप्राप्त को, कोसेंगी वे वाम ।जिनके प्रिय ने स्वप्न में, मिल न दिया आराम ॥
1220 यों कहते प्रिय का मुझे, जाग्रति में नहिं योग ।सपने में ना देखते, क्या इस पुर के लोग ॥
अध्याय 123. संध्या दर्शन से#
1221 तेरी, सांझ, चिरायु हो, तू नहिं संध्याकाल ।ब्याह हुओं की जान तू, लेता अन्तिम काल ।
1222 तेरी, सांझ, चिरायु हो, तू निष्प्रभ विभ्रान्त ।मेरे प्रिय के सम निठुर, है क्या तेरा कान्त ॥
1223 कंपित संध्या निष्प्रभा, मुझको बना विरक्त ।आती है देती मुझे, पीड़ा अति ही सख्त ॥
1224 वध करने के स्थान में, ज्यों आते जल्लाद ।त्यों आती है सांझ भी, जब रहते नहिं नाथ ॥
1225 मैंने क्या कुछ कर दिया, प्रात: का उपकार ।वैसे तो क्या कर दिया, संध्या का उपकार ॥
1226 पीड़ित करना सांझ का, तब था मुझे न ज्ञात ।गये नहीं थे बिछुड़कर, जब मेरे प्रिय नाथ ॥
1227 काम-रोग तो सुबह को, पा कर कली-लिवास ।दिन भर मुकुलित, शाम को, पाता पुष्य-विकास ॥
1228 दूत बनी है सांझ का, जो है अनल समान ।गोप-बाँसुरी है, वही, घातक भी सामान ॥
1229 जब आवेगी सांझ बढ़, करके मति को घूर्ण ।सारा पुर मति-घूर्ण हो, दुख से होवे चूर्ण ॥
1230 भ्रांतिमती इस सांझ में, अब तक बचती जान ।धन-ग्राहक का स्मरण कर, चली जायगी जान ॥
अध्याय 124. अंगच्छवि-नाश#
1231 प्रिय की स्मृति में जो तुझे, दुख दे गये सुदूर ।रोते नयन सुमन निरख, लज्जित हैं बेनूर ॥
1232 पीले पड़ कर जो नयन, बरस रहे हैं नीर ।मानों कहते निठुरता, प्रिय की जो बेपीर ॥
1233 जो कंधे फूल रहे, जब था प्रिय-संयोग ।मानों करते घोषणा, अब है दुसह वियोग ॥
1234 स्वर्ण वलय जाते खिसक, कृश हैं कंधे पीन ।प्रिय-वियोग से पूर्व की, छवि से हैं वे हीन ॥
1235 वलय सहित सौन्दर्य भी, जिन कंधों को नष्ट ।निष्ठुर के नैष्ठुर्य को, वे कहते हैं स्पष्ट ॥
1236 स्कंध शिथिल चूड़ी सहित, देख मुझे जो आप ।कहती हैं उनको निठुर, उससे पाती ताप ॥
1237 यह आक्रान्दन स्कंध का, जो होता है क्षाम ।सुना निठुर को रे हृदय, पाओ क्यों न सुनाम ॥
1238 आलिंगन के पाश से, शिथिल किये जब हाथ ।तत्क्षण पीला पड गया, सुकुमारी का माथ ॥
1239 ज़रा हवा जब घुस गयी, आलिंगन के मध्य ।मुग्धा के पीले पड़े, शीत बड़े दृग सद्य ॥
1240 उज्ज्वल माथे से जनित, पीलापन को देख ।पीलापन को नेत्र के, हुआ दुःख-अतिरेक ॥
अध्याय 125. हृदय से कथन#
1241 रोग-शमन हित रे हृदय, जो यह हुआ असाध्य ।क्या न कहोगे सोच कर, कोई औषध साध्य ॥
1242 हृदय ! जिओ तुम, नाथ तो, करते हैं नहिं प्यार ।पर तुम होते हो व्यथित, यह मूढ़ता अपार ॥
1243 रे दिल ! बैठे स्मरण कर, क्यों हो दुख में चूर ।दुःख-रोग के जनक से, स्नेह-स्मरण है दूर ॥
1244 नेत्रों को भी ले चलो, अरे हृदय, यह जान ।उनके दर्शन के लिये, खाते मेरी जान ॥
1245 यद्यपि हम अनुरक्त हैं, वे हैं नहिं अनुरक्त ।रे दिल, यों निर्मम समझ, हो सकते क्या त्यक्त ॥
1246 जब प्रिय देते मिलन सुख, गया नहीं तू रूठ ।दिल, तू जो अब क्रुद्ध है, वह है केवल झूठ ॥
1247 अरे सुदिल, तज काम को, या लज्जा को त्याग ।मैं तो सह सकती नहीं, इन दोनों की आग ॥
1248 रे मेरे दिल, यों समझ, नहीं दयार्द्र सुजान ।बिछुड़े के पीछे लगा, चिन्ताग्रस्त अजान ॥
1249 तेरे अन्दर जब रहा, प्रियतम का आवास ।रे दिल, उनका स्मरण कर, जावे किसके पास ॥
1250 फिर न मिले यों तज दिया, उनको दिल में ठौर ।देने से मैं खो रही, अभ्यन्तर छवि और ॥
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