
तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 126-130#
Thirukkural in Hindi, Chapters 126 to 130#
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Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).
भाग–३: काम- कांड
अध्याय 126. धैर्य-भंग#
1251 लाज-चटखनी युक्त है, मनोधैर्य का द्वार ।खंडन करना है उसे, यह जो काम-कुठार ॥
1252 काम एक निर्दय रहा, जो दिल पर कर राज ।अर्द्ध रात्रि के समय भी, करवाता है काज ॥
1253 काम छिपाने यत्न तो, मैं करती हूँ जान ।प्रकट हुआ निर्देश बिन, वह तो छींक समान ॥
1254 कहती थी ‘हूँ धृतिमती’, पर मम काम अपार ।प्रकट सभी पर अब हुआ, गोपनीयता पार ॥
1255 उनके पीछे जा लगें, जो तज गये सुजान ।काम-रोगिणी को नहीं, इस बहुमति का ज्ञान ॥
1256 उनके पीछे लग रहूँ, चले गये जो त्याग ।काम-रोग को यों दिया, यह मेरा बड़भाग ॥
1257 करते ये प्रिय नाथ जब, कामेच्छित सब काज ।तब यह ज्ञात न था हमें, एक वस्तु है लाज ॥
1258 बहुमायामय चोर के, जो हैं नयमय बैन ।मेरी धृति को तोड़ने, क्या होते नहिं सैन ॥
1259 चली गई मैं रूठने, किन्तु हृदय को देख ।वह प्रवृत्त है मिलन हित, गले लगी, हो एक ॥
1260 अग्नि-दत्त मज्जा यथा, जिनका दिल द्रवमान ।उनको प्रिय के पास रह, क्या संभव है मान ॥
अध्याय 127. उनकी उत्कंठा#
1261 छू कर गिनते विरह दिन, घिस अंगुलियाँ क्षीण ।तथा नेत्र भी हो गये, राह देख छवि-हीन ॥
1262 उज्ज्वल भूषण सज्जिते ! यदि मैं भूलूँ आज ।गिरें बाँह से चुड़ियाँ, औ’ खोऊँ छवि-साज ॥
1263 विजय-कामना से चले, साथ लिये उत्साह ।सो अब भी जीती रही, ‘लौटेंगे’ यों चाह ॥
1264 प्रेम सहित हैं लौटते, बिछुड़ गये जो नाथ ।उमड़ रहा यों सोच कर, हृदय खुशी के साथ ॥
1265 प्रियतम को मैं देख लूँ, आँखों से भरपूर ।फिर पीलापन स्कंध का, हो जायेगा दूर ॥
1266 प्रिय आवें तो एक दिन,यों कर लूँ रसपान ।जिससे पूरा ही मिटे, दुःखद रोग निदान ॥
1267 नेत्र सदृश प्रिय आ मिलें, तो कर बैठूँ मान ?या आलिंगन ही करूँ, या दोनों, हे प्राण ॥
1268 क्रियाशील हो युद्ध कर, राजा पावें जीत ।सपत्नीक हम भोज दें, संध्या हित सप्रीत ॥
1269 जिसे प्रवासी पुरुष के, प्रत्यागम का सोच ।एक रोज़ है सात सम, लंबा होता रोज़ ॥
1270 प्राप्य हुई या प्राप्त ही, या हो भी संयोग ।हृदय भग्न हो चल बसी, तो क्या हो उपयोग ॥
अध्याय 128. इंगित से बोध#
1271 रखने पर भी कर छिपा, मर्यादा को पार ।हैं तेरे ही नेत्र कुछ, कहने का तैयार ॥
1272 छवि भरती है आँख भर, बाँस सदृश हैं स्कंध ।मुग्धा में है मूढ़ता, नारी-सुलभ अमंद ॥
1273 अन्दर से ज्यों दीखता, माला-मणि में सूत ।बाला छवि में दीखता, कुछ संकेत प्रसूत ॥
1274 बद कली में गंध ज्यों, रहती है हो बंद ।त्यों इंगित इक बंद है, मुग्धा-स्मिति में मंद ॥
1275 बाला ने, चूड़ी-सजी, मुझसे किया दुराव ।दुःख निवारक इक दवा, रखता है वह हाव ॥
1276 दे कर अतिशय मिलन सुख, देना दुःख निवार ।स्मारक भावी विरह का, औ’ निष्प्रिय व्यवहार ॥
1277 नायक शीतल घाट का, बिछुड़ जाय यह बात ।मेरे पहले हो गयी, इन वलयों को ज्ञात ॥
1278 कल ही गये वियुक्त कर, मेरे प्यारे नाथ ।पीलापन तन को लिये, बीत गये दिन सात ॥
1279 वलय देख फिर स्कंध भी, तथा देख निज पाँव ।यों उसने इंगित किया, साथ गमन का भाव ॥
1280 काम-रोग को प्रगट कर, नयनों से कर सैन ।याचन करना तो रहा, स्त्रीत्व-लब्ध गुण स्त्रैण ॥
अध्याय 129. मिलन-उत्कंठा#
1281 मुद होना स्मृति मात्र से, दर्शन से उल्लास ।ये गुण नहीं शराब में, रहे काम के पास ॥
1282 यदि आवेगा काम तो, बढ़ कर ताड़ समान ।तिल भर भी नहिं चाहिये, करना प्रिय से मान ॥
1283 यद्यपि मनमानी करें, बिन आदर की सैन ।प्रियतम को देखे बिना, नयनों को नहिं चैन ॥
1284 गयी रूठने री सखी, करके मान-विचार ।मेरा दिल वह भूल कर, मिलने को तैयार ॥
1285 कूँची को नहिं देखते, यथा आंजते अक्ष ।उनकी भूल न देखती, जब हैं नाथ समक्ष ॥
1286 जब प्रिय को मैं देखती, नहीं देखती दोष ।ना देखूँ तो देखती, कुछ न छोड़ कर दोष ॥
1287 कूदे यथा प्रवाह में, बाढ़ बहाती जान ।निष्फलता को जान कर, क्या हो करते मान ॥
1288 निन्दाप्रद दुख क्यों न दे, मद्यप को ज्यों पान ।त्यों है, वंचक रे, हमें, तेरी छाती जान ॥
1289 मृदुतर हो कर सुमन से, जो रहता है काम ।बिरले जन को प्राप्त है, उसका शुभ परिणाम ॥
1290 उत्कंठित मुझसे अधिक, रही मिलन हित बाल ।मान दिखा कर नयन से, गले लगी तत्काल ॥
अध्याय 130. हृदय से रूठना#
1291 उनका दिल उनका रहा, देते उनका साथ ।उसे देख भी, हृदय तू, क्यों नहिं मेरे साथ ॥
1292 प्रिय को निर्मम देख भी, ‘वे नहिं हो नाराज़’ ।यों विचार कर तू चला, रे दिल, उनके पास ॥
1293 रे दिल, जो हैं कष्ट में, उनके हैं नहिं इष्ट ।सो क्या उनका पिछलगा, बना यथा निज इष्ट ॥
1294 रे दिल तू तो रूठ कर, बाद न ले सुख-स्वाद ।तुझसे कौन करे अभी, तत्सम्बन्धी बात ॥
1295 न मिल तो भय, या मिले, तो भेतव्य वियोग ।मेरा दिल है चिर दुखी, वियोग या संयोग ॥
1296 विरह दशा में अलग रह, जब करती थी याद ।मानों मेरा दिल मुझे, खाता था रह साथ ॥
1297 मूढ हृदय बहुमति रहित, नहीं भूलता नाथ ।मैं भूली निज लाज भी, पड़ कर इसके साथ ॥
1298 नाथ-उपेक्षा निंद्य है, यों करके सुविचार ।करता उनका गुण-स्मरण, यह दिल जीवन-प्यार ॥
1299 संकट होने पर मदद, कौन करेगा हाय ।जब कि निजी दिल आपना, करता नहीं सहाय ॥
1300 बन्धु बनें नहिं अन्य जन, है यह सहज, विचार ।जब अपना दिल ही नहीं, बनता नातेदार ॥
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