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Thirukkural in Hindi Chapter 41 to 45 - तिरुक्कूरळ

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Sanskrit Text Thiruvalluvar Thirukkural in Hindi

तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 41-45
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Thirukkural in Hindi, Chapters 41 to 45
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Chapters 36 to 40 · All chapters · Chapter list · Chapters 46 to 50

Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).

भाग–२: अर्थ- कांड

अध्याय 41. अशिक्षा
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401 सभा-मध्य यों बोलना, बिना पढ़े सदग्रन्थ ।है पासे का खेल ज्यों, बिन चौसर का बंध ॥
402 यों है अपढ़ मनुष्य की, भाषण-पटुता-चाह ।ज्यों दोनों कुचरहित की, स्त्रीत्व-भोग की चाह ॥
403 अपढ़ लोग भी मानिये, उत्तम गुण का भौन ।विद्वानों के सामने, यदि साधेंगे मौन ॥
404 बहुत श्रेष्ठ ही क्यों न हो, कभी मूर्ख का ज्ञान ।विद्वज्जन का तो उसे, नहीं मिलेगा मान ॥
405 माने यदि कोई अपढ़, बुद्धिमान ही आप ।मिटे भाव वह जब करें, बुध से वार्त्तालाप ॥
406 जीवित मात्र रहा अपढ़, और न कुछ वह, जान ।उत्पादक जो ना रही, ऊसर भूमि समान ॥
407 सूक्ष्म बुद्धि जिसकी नहीं, प्रतिभा नहीं अनूप ।मिट्टी की सुठि मूर्ति सम, उसका खिलता रूप ॥
408 शिक्षित के दारिद्रय से, करती अधिक विपत्ति ।मूर्ख जनों के पास जो, जमी हुई संपत्ति ॥
409 उच्छ जाति का क्यों न हो, तो भी अपढ़ अजान ।नीच किन्तु शिक्षित सदृश, पाता नहिं सम्मान ॥
410 नर से पशु की जो रहा, तुलना में अति भेद ।अध्येत सद्‍ग्रन्थ के, तथा अपढ़ में भेद ॥

अध्याय 42. श्रवण
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411 धन धन में तो श्रवण-धन, रहता अधिक प्रधान ।सभी धनों में धन वही, पाता शीर्षस्थान ॥
412 कानों को जब ना मिले, श्रवण रूप रस पान ।दिया जाय तब पेट को, कुछ भोजन का दान ॥
413 जिनके कानों को मिला, श्रवण रूप में भोग ।हवि के भोजी देव सम, भुवि में हैं वे लोग ॥
414 यद्यपि शिक्षित है नहीं, करे श्रवण सविवेक ।क्लांत दशा में वह उसे, देगा सहाय टेक ॥
415 फिसलन पर चलते हुए, ज्यों लाठी की टेक ।त्यों हैं, चरित्रवान के, मूँह के वच सविवेक ॥
416 श्रवण करो सद्विषय का, जितना ही हो अल्प ।अल्प श्रवण भी तो तुम्हें, देगा मान अनल्प ॥
417 जो जन अनुसंधान कर, रहें बहु-श्रुत साथ ।यद्यपि भूलें मोहवश, करें न जड़ की बात ॥
418 श्रवण श्रवण करके भला, छिद न गये जो कान ।श्रवण-शक्ति रखते हुए, बहरे कान समान ॥
419 जिन लोगों को है नहीं, सूक्ष्म श्रवण का ज्ञान ।नम्र वचन भी बोलना, उनको दुष्कर जान ॥
420 जो जाने बिन श्रवण रस, रखता जिह्‍वा-स्वाद ।चाहे जीये या मरे, उससे सुख न विषाद ॥

अध्याय 43. बुद्धिमत्ता
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421 रक्षा हित कै नाश से, बुद्धिरूप औजार ।है भी रिपुओं के लिये, दुर्गम दुर्ग आपार ॥
422 मनमाना जाने न दे, पाप-मार्ग से थाम ।मन को लाना सुपथ पर, रहा बुद्धि का काम ॥
423 चाहे जिससे भी सुनें, कोई भी हो बात ।तत्व-बोध उस बात का, बुद्धि युक्तता ज्ञात ॥
424 कह प्रभावकर ढंग से, सुगम बना स्वविचार ।सुधी समझता अन्य के, सूक्ष्म कथन का सार ॥
425 मैत्री उत्तम जगत की, करते हैं धीमान ।खिल कर सकुचाती नहीं, सुधी-मित्रता बान ॥
426 जैसा लोकाचार है, उसके ही उपयुक्त ।जो करना है आचारण, वही सुधी के युक्त ॥
427 बुद्धिमान वे हैं जिन्हें, है भविष्य का ज्ञान ।बुद्धिहीन वे हैं जिन्हें, प्राप्त नहीं वह ज्ञान ॥
428 निर्भयता भेतव्य से, है जड़ता का नाम ।भय रखना भेतव्य से, रहा सुधी का काम ॥
429 जो भावी को जान कर, रक्षा करता आप ।दुःख न दे उस प्राज्ञ को, भयकारी संताप ॥
430 सब धन से संपन्न हैं, जो होते मतिमान ।चाहे सब कुछ क्यों न हो, मूर्ख दरिद्र समान ॥

अध्याय 44. दोष-निवारण
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431 काम क्रोध मद दोष से, जो होते हैं मुक्त ।उनकी जो बढ़ती हुई, होती महिमा-युक्त ॥
432 हाथ खींचना दान से, रखना मिथ्या मान ।नृप का अति दाक्षिण्य भी, मानो दोष अमान ॥
433 निन्दा का डर है जोन्हें, तिलभर निज अपराध ।होता तो बस ताड़ सम, मानें उसे अगाध ॥
434 बचकर रहना दोष से, लक्ष्य मान अत्यंत ।परम शत्रु है दोष ही, जो कर देगा अंत ॥
435 दोष उपस्थिति पूर्व ही, किया न जीवन रक्ष ।तो वह मिटता है यथा, भूसा अग्नि समक्ष ॥
436 दोष-मुक्त कर आपको, बाद पराया दाष ।जो देखे उस भूप में, हो सकता क्या दोष ॥
437 जो धन में आसक्त है, बिना किये कर्तव्य ।जमता उसके पास जो, व्यर्थ जाय वह द्रव्य ॥
438 धनासक्ति जो लोभ है, वह है दोष विशेश |अन्तर्गत उनके नहीं, जितने दोष अशेष ॥
439 श्रेष्ठ समझ कर आपको, कभी न कर अभिमान ।चाह न हो उस कर्म की, जो न करे कल्याण ॥
440 भोगेगा यदि गुप्त रख, मनचाहा सब काम ।रिपुओं का षड्‍यंत्र तब, हो जावे बेकाम ॥

अध्याय 45. सत्संग-लाभ
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441 ज्ञानवृद्ध जो बन गये, धर्म-सूक्ष्म को जान ।मैत्री उनकी, ढ़ंग से, पा लो महत्व जान ॥
442 आगत दुःख निवार कर, भावी दुःख से त्राण ।करते जो, अपना उन्हें, करके आदर-मान ॥
443 दुर्लभ सब में है यही, दुर्लभ भाग्य महान ।स्वजन बनाना मान से, जो हैं पुरुष महान ॥
444 करना ऐसा आचरण, जिससे पुरुष महान ।बन जावें आत्मीय जन, उत्तम बल यह जान ॥
445 आँख बना कर सचिव को, ढोता शासन-भार ।सो नृप चुन ले सचिव को, करके सोच विचार ॥
446 योग्य जनों का बन्धु बन, करता जो व्यवहार ।उसका कर सकते नहीं, शत्रु लोग अपकार ॥
447 दोष देख कर डाँटने जब हैं मित्र सुयोग्य ।तब नृप का करने अहित, कौन शत्रु है योग्य ॥
448 डांट-डपटते मित्र की, रक्षा बिन नरकंत ।शत्रु बिना भी हानिकर, पा जाता है अंत ॥
449 बिना मूलधन वणिक जन, पावेंगे नहिं लाभ ।सहचर-आश्रय रहित नृप, करें न स्थिरता लाभ ॥
450 बहुत जनों की शत्रुता, करने में जो हानि ।उससे बढ़ सत्संग को, तजने में है हानि ॥

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