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Thirukkural in Hindi Chapter 51 to 55 - तिरुक्कूरळ

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Sanskrit Text Thiruvalluvar Thirukkural in Hindi

तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 51-55
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Thirukkural in Hindi, Chapters 51 to 55
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Chapters 46 to 50 · All chapters · Chapter list · Chapters 56 to 60

Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).

भाग–२: अर्थ- कांड

अध्याय 51. परख कर विश्वास करना
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501 धर्म-अर्थ औ’ काम से, मिला प्राण-भय चार ।इन उपधाओं से परख, विश्वस्त है विचार ॥
502 जो कुलीन निर्दोष हो, निन्दा से भयभीत ।तथा लजीला हो वही, विश्वस्त है पुनीत ॥
503 ज्ञाता विशिष्ट शास्त्र के, औ’ निर्दोष स्वभाव ।फिर भी परखो तो उन्हें, नहिं अज्ञता-अभाव ॥
504 परख गुणों को फिर परख, दोषों को भी छान ।उनमें बहुतायत परख, उससे कर पहचान ॥
505 महिमा या लघिमा सही, इनकी करने जाँच ।नर के निज निज कर्म ही, बनें कसौटी साँच ॥
506 विश्वसनीय न मानिये, बन्धुहीन जो लोग ।निन्दा से लज्जित न हैं, स्नेह शून्य वे लोग ॥
507 मूर्ख जनों पर प्रेमवश, जो करता विश्वास ।सभी तरह से वह बने, जड़ता का आवास ।
508 परखे बिन अज्ञात पर, किया अगर विश्वास ।संतित को चिरकाल तक, लेनी पड़े असाँस ॥
509 किसी व्यक्ति पर मत करो, परखे बिन विश्वास ।बेशक सौंपो योग्य यद, करने पर विश्वास ॥
510 परखे बिन विश्वास भी, औ’ करके विश्वास ।फिर करना सन्देह भी, देते हैं चिर नाश ॥

अध्याय 52. परख कर कार्य सौंपना
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511 भले-बुरे को परख जो, करता भला पसंद ।उसके योग्य नियुक्ति को, करना सही प्रबन्ध ॥
512 आय-वृद्धि-साधन बढ़ा, धन-वर्द्धक कर कार्य ।विघ्न परख जो टालता, वही करे नृप-कार्य ॥
513 प्रेम, बुद्धि, दृढ़-चित्तता, निर्लोभता-सुनीति ।चारों जिसमें पूर्ण हों, उसपर करो प्रतीति ॥
514 सभी तरह की परख से,योग्य दिखें जो लोग ।उनमें कार्य निबाहते, विकृत बने बहु लोग ॥
515 जो करता है धैर्य से, खूब समझ सदुपाय ।उसे छोड़ प्रिय बन्धु को, कार्य न सौंपा जाय ॥
516 कर्ता का लक्षण परख, परख कर्म की रीति ।संयोजित कर काल से, सौंपों सहित प्रतीति ॥
517 इस साधन से व्यक्ति यह, कर सकता यह कार्य ।परिशीलन कर इस तरह, सौंप उसे वह कार्य ॥
518 यदि पाया इक व्यक्ति को, परख कार्य के योग्य ।तो फिर उसे नियुक्त कर, पदवी देना योग्य ॥
519 तत्परता-वश कार्य में, हुआ मित्र व्यवहार ।उसको समझे अन्यता, तो श्री जावे पार ॥
520 राज-भृत्य यदि विकृत नहिं, विकृत न होगा राज ।रोज़ परखना चाहिये, नृप को उसका काज ॥

अध्याय 53. बन्धुओं को अपनाना
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521 यद्यपि निर्धन हो गये, पहले कृत उपकार ।कहते रहे बखान कर, केवल नातेदार ॥
522 बन्धु-वर्ग ऐसा मिले, जिसका प्रेम अटूट ।तो वह दे संपत्ति सब , जिसकी वृद्धिअटूट ॥
523 मिलनसार जो है नहीं, जीवन उसका व्यर्थ ।तट बिन विस्तृत ताल ज्यों, भरता जल से व्यर्थ ॥
524 अपने को पाया धनी, तो फल हो यह प्राप्त ।बन्धु-मंडली घिर रहे, यों रहना बन आप्त ॥
525 मधुर वचन जो बोलता, करता भी है दान ।बन्धुवर्ग के वर्ग से, घिरा रहेगा जान ॥
526 महादान करते हुए, जो है क्रोध-विमुक्त ।उसके सम भू में नहीं, बन्धुवर्ग से युक्त ॥
527 बिना छिपाये काँव कर, कौआ खाता भोज्य ।जो हैं उसी स्वभाव के, पाते हैं सब भोग्य ॥
528 सब को सम देखे नहीं, देखे क्षमता एक ।इस गुण से स्थायी रहें, नृप के बन्धु अनेक ॥
529 बन्धु बने जो जन रहे, तोड़े यदि बन्धुत्व ।अनबन का कारण मिटे, तो बनता बन्धुत्व ॥
530 कारण बिन जो बिछुड़ कर, लौटे कारण साथ ।साध-पूर्ति कर नृप उसे, परख, मिला के साथ ॥

अध्याय 54. अविस्मृति
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531 अमित हर्ष से मस्त हो, रहना असावधान ।अमित क्रोध से भी अधिक, हानि करेगा जान ॥
532 ज्यों है नित्यदारिद्रता, करती बुद्धि-विनाश ।त्यों है असावधानता, करती कीर्ति-विनाश ॥
533 जो विस्मृत हैं वे नहीं, यश पाने के योग ।जग में यों हैं एकमत, शास्त्रकार सब लोग ॥
534 लाभ नहीं है दुर्ग से, उनको जो भयशील ।वैसे उनको ना भला, जो हैं विस्मृतिशील ॥
535 पहले से रक्षा न की, रह कर असावधान ।विपदा आने पर रहा, पछताता अज्ञान ॥
536 सब जन से सब काल में, अविस्मरण की बान ।बरती जाय अचूक तो, उसके है न समान ॥
537 रह कर विस्मृति के बिना, सोच-समझ कर कार्य ।यदि करता है तो उसे, कुछ नहिं असाध्य कार्य ॥
538 करना श्रद्धा-भाव से, शास्त्रकार-स्तुत काम ।रहा उपेक्षक, यदि न कर, सात जन्म बेकाम ॥
539 जब अपने संतोष में, मस्त बनेंगे आप ।गफलत से जो हैं मिटे, उन्हें विचारो आप ॥
540 बना रहेगा यदि सदा, लक्ष्य मात्र का ध्यान ।अपने इच्छित लक्ष्य को, पाना है आसान ॥

अध्याय 55. सुशासन
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541 सबसे निर्दाक्षिण्य हो, सोच दोष की रीती ।उचित दण्ड़ निष्पक्ष रह, देना ही है नीति ॥
542 जीवित हैं ज्यों जीव सब, ताक मेघ की ओर ।प्रजा ताक कर जी रही, राजदण्ड की ओर ॥
543 ब्राहमण-पोषित वेद औ’, उसमें प्रस्तुत धर्म ।इनका स्थिर आधार है, राजदण्ड का धर्म ॥
544 प्रजा-पाल जो हो रहा, ढोता शासन-भार ।पाँव पकड़ उस भूप के, टिकता है संसार ॥
545 है जिस नृप के देश में, शासन सुनीतिपूर्ण ।साथ मौसिमी वृष्टि के, रहे उपज भी पूर्ण ॥
546 रजा को भाला नहीं, जो देता है जीत ।राजदण्ड ही दे विजय, यदि उसमें है सीध ॥
547 रक्षा सारे जगत की, करता है नरनाथ ।उसका रक्षक नीति है, यदि वह चले अबाध ॥
548 न्याय करे नहिं सोच कर, तथा भेंट भी कष्ट ।ऐसा नृप हो कर पतित, होता खुद ही नष्ट ॥
549 जन-रक्षण कर शत्रु से, करता पालन-कर्म ।दोषी को दे दण्ड तो, दोष न, पर नृप-धर्म ॥
550 यथा निराता खेत को, रखने फसल किसान ।मृत्यु-दण्ड नृप का उन्हें, जो हैं दुष्ट महान ॥

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