
तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 91-95#
Thirukkural in Hindi, Chapters 91 to 95#
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Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).
भाग–२: अर्थ- कांड
अध्याय 91. स्त्री-वश होना#
901 स्त्री पर जो आसक्त हैं, उनको मिले न धर्म ।अर्थार्थी के हित रहा, घृणित वस्तु वह कर्म ॥
902 स्त्री लोलुप की संपदा, वह है पौरुष-त्यक्त ।लज्जास्पद बन कर बड़ी, लज्जित करती सख्त ॥
903 डरने की जो बान है, स्त्री से दब कर नीच ।सदा रही लज्जाजनक, भले जनों के बीच ॥
904 गृहिणी से डर है जिसे, औ’ न मोक्ष की सिद्धि ।उसकी कर्म-विदग्धता, पाती नहीं प्रसिद्धि ॥
905 पत्नी-भीरु सदा डरे, करने से वह कार्य ।सज्जन लोगों के लिये, जो होते सत्कार्य ॥
906 जो डरते स्त्री-स्कंध से, जो है बाँस समान ।यद्यपि रहते देव सम, उनका है नहिं मान ॥
907 स्त्री की आज्ञा पालता, जो पौरुष निर्लज्ज ॥उससे बढ कर श्रेष्ठ है, स्त्री का स्त्रीत्व सलज्ज ॥
908 चारु मुखी वंछित वही, करते हैं जो कर्म ।भरते कमी न मित्र की, करते नहीं सुधर्म ॥
909 धर्म-कर्म औ’ प्रचुर धन, तथा अन्य जो काम ।स्त्री के आज्ञापाल को, इनका नहिं अंजाम ॥
910 जिनका मन हो कर्मरत, औ’ जो हों धनवान ।स्त्री-वशिता से उन्हें, कभी न है अज्ञान ॥
अध्याय 92. वार-वनिता#
911 चाह नहीं है प्रेमवश, धनमूलक है चाह ।ऐसी स्त्री का मधुर वच, ले लेता है आह ॥
912 मधुर वचन है बोलती, तोल लाभ का भाग ।वेश्या के व्यवहार को, सोच समागम त्याग ॥
913 पण-स्त्री आलिंगन रहा, यों झूठा ही जान ।ज्यों लिपटे तम-कोष्ठ में, मुरदे से अनजान ॥
914 रहता है परमार्थ में, जिनका मनोनियोग ।अर्थ-अर्थिनी तुच्छ सुख, करते नहिं वे भोग ॥
915 सहज बुद्धि के साथ है, जिनका विशिष्ट ज्ञान ।पण्य-स्त्री का तुच्छ सुख, भोगेंगे नहिं जान ॥
916 रूप-दृप्त हो तुच्छ सुख, जो देती हैं बेच ।निज यश-पालक श्रेष्ठ जन, गले लगें नहिं, हेच ॥
917 करती है संभोग जो, लगा अन्य में चित्त ।उससे गले लगे वही, जिसका चंचल चित्त ॥
918 जो स्त्री है मायाविनी, उसका भोग विलास ।अविवेकी जन के लिये, रहा मोहिनी-पाश ॥
919 वेश्या का कंधा मृदुल, भूषित है जो खूब ।मूढ-नीच उस नरक में, रहते हैं कर डूब ॥
920 द्वैध-मना व्यभिचारिणी, मद्य, जुए का खेल ।लक्ष्मी से जो त्यक्त हैं, उनका इनसे मेल ॥
अध्याय 93. मद्य-निषेध#
921 जो मधु पर आसक्त हैं, खोते हैं सम्मान ।शत्रु कभी डरते नहीं, उनसे कुछ भय मान ॥
922 मद्य न पीना, यदि पिये, वही पिये सोत्साह ।साधु जनों के मान की, जिसे नहीं परवाह ॥
923 माँ के सम्मुख भी रही, मद-मत्तता खराब ।तो फिर सम्मुख साधु के, कितनी बुरी शराब ॥
924 जग-निंदित अति दोषयुत, जो हैं शराबखोर ।उनसे लज्जा-सुन्दरी, मूँह लेती है मोड़ ॥
925 विस्मृति अपनी देह की, क्रय करना दे दाम ।यों जाने बिन कर्म-फल, कर देना है काम ॥
926 सोते जन तो मृतक से, होते हैं नहिं भिन्न ।विष पीते जन से सदा, मद्यप रहे अभिन्न ॥
927 जो लुक-छिप मधु पान कर, खोते होश-हवास ।भेद जान पुर-जन सदा, करते हैं परिहास ॥
928 ‘मधु पीना जाना नहीं’, तज देना यह घोष ।पीने पर झट हो प्रकट, मन में गोपित दोष ॥
929 मद्यप का उपदेश से, होना होश-हवास ।दीपक ले जल-मग्न की, करना यथा तलाश ॥
930 बिना पिये रहते समय, मद-मस्त को निहार ।सुस्ती का, पीते स्वयं, करता क्यों न विचार ॥
अध्याय 94. जुआ#
931 चाह जुए की हो नहीं, यद्यपि जय स्वाधीन ।जय भी तो कांटा सदृश, जिसे निगलता मीन ॥
932 लाभ, जुआरी, एक कर, फिर सौ को खो जाय ।वह भी क्या सुख प्राप्ति का, जीवन-पथ पा जाय ॥
933 पासा फेंक सदा रहा, करते धन की आस ।उसका धन औ’ आय सब, चलें शत्रु के पास ॥
934 करता यश का नाश है, दे कर सब दुख-जाल ।और न कोई द्यूत सम, बनायगा कंगाल ॥
935 पासा, जुआ-घर तथा, हस्य-कुशलता मान ।जुए को हठ से पकड़, निर्धन हुए निदान ॥
936 जुआरूप ज्येष्ठा जिन्हें, मूँह में लेती ड़ाल ।उन्हें न मिलता पेट भर, भोगें दुख कराल ॥
937 द्यूत-भुमि में काल सब, जो करना है वास ।करता पैतृक धन तथा, श्रेष्ठ गुणों का नाश ॥
938 पेरित मिथ्या-कर्म में, करके धन को नष्ट ।दया-धर्म का नाश कर, जुआ दिलाता कष्ट ॥
939 रोटी कपड़ा संपदा, विद्या औ’ सम्मान ।पाँचों नहिं उनके यहाँ, जिन्हें जुए की बान ॥
940 खोते खोते धन सभी, यथा जुएँ में मोह ।सहते सहते दुःख भी, है जीने में मोह ॥
अध्याय 95. औषध#
941 वातादिक जिनको गिना, शास्त्रज्ञों ने तीन ।बढ़ते घटते दुःख दें, करके रोगाधीन ॥
942 खादित का पचना समझ, फिर दे भोजन-दान ।तो तन को नहिं चाहिये, कोई औषध-पान ॥
943 जीर्ण हुआ तो खाइये, जान उचित परिमाण ।देहवान हित है वही, चिरायु का सामान ॥
944 जीर्ण कुआ यह जान फिर, खूब लगे यदि भूख ।खाओ जो जो पथ्य हैं, रखते ध्यान अचूक ॥
945 करता पथ्याहार का, संयम से यदि भोग ।तो होता नहिं जीव को, कोई दुःखद रोग ॥
946 भला समझ मित भोज का, जीमे तो सुख-वास ।वैसे टिकता रोग है, अति पेटू के पास ॥
947 जाठराग्नि की शक्ति का, बिना किये सुविचार ।यदि खाते हैं अत्याधिक, बढ़ते रोग अपार ॥
948 ठीक समझ कर रोग क्या, उसका समझ निदान ।समझ युक्ति फिर शमन का, करना यथा विधान ॥
949 रोगी का वय, रोग का, काल तथा विस्तार ।सोच समझकर वैद्य को, करना है उपचार ॥
950 रोगी वैद्य देवा तथा, तीमारदार संग ।चार तरह के तो रहे, वैद्य शास्त्र के अंग ॥
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